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Ancient Indian History MCQ - UPPCS Prelims 1994


Indian ancient history mcq UPPCS - 1994
UPPCS 1994 प्रारंभिक परीक्षा  - बहुविकल्पीय प्रश्न व्याख्या सहित - प्राचीन भारतीय इतिहास 

प्र०-1. सैन्धव सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता भी इसलिये कहा जाता है क्योंकि -
( a ) सैन्धव सभ्यता की खोज हड़प्पा में हुई थी
( b ) हड़प्पा सिन्धु घाटी में अवस्थित है  
( c ) हड़प्पा सैन्धव नगरों में सबसे बड़ा था  
( d ) सैन्धव सभ्यता का प्रारम्भ हड़प्पा में हुआ

उत्तर ( a ) सैन्धव सभ्यता की खोज हड़प्पा में हुई थी
व्याख्या : सैन्धव सभ्यता की खोज सर्वप्रथम 1921 ई ० में हड़प्पा नामक पुरास्थल में की गई थी , इसीलिए सैन्धव सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है । हड़प्पा नामक पुरास्थल पंजाब ( पाकिस्तान ) प्रान्त के शाहीवाल जिले में रावी नदी के बायें तट पर अवस्थित है ।
स्रोत पुरातत्व विमर्श , डॉ ० जे ० एन ० पाण्डेय

प्र०-2. निम्नलिखित पशु - समूहों में से कौन - सा समूह मोहनजोदड़ो की पशुपति मुद्रा पर अंकित है ?
( a ) सिंह , हाथी , भैंसा और वृषभ
( b ) व्याघ्र , हाथी , गैंडा और भैंसा
( c ) सिंह , गैंडा , भैंसा और घोड़ा
( d ) वृषभ , भैंसा , हाथी और गैंडा

उत्तर ( b ) व्याघ्र , हाथी , गैंडा और भैंसा
व्याख्या : मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर योग मुद्रा में सिंहासन पर आसीन पशुओं से घिरा हुआ एक त्रिमुखी पुरूष दिखाया गया है जो भैंसे के श्रृंग वाला सिर मुकुट पहने है । दाहिनी  ओर एक हाथी एवं व्याघ्र ( बाघ ) तथा बायीं तरफ एक गैण्डा तथा एक भैंसा और सिंहासन के नीचे हिरण युगल दर्शित है । इस पुरुष का समीकरण मार्शल ने ' पशुपति शिव ' से किया है ।
स्रोत - पुरातत्व अनुशीलन , डॉ ० राधाकान्त वर्मा , डॉ . नीरा वर्मा

प्र०-3. निम्नलिखित में से किस हड़प्पीय स्थल से अग्निवेदिकाओं के प्रमाण मिले हैं ?
( a ) अम्री .
( b ) मोहनजोदड़ो
( c ) हड़प्पा
( d ) कालीबंगा

उत्तर ( d ) कालीबंगा
व्याख्या : कालीबंगा ( राजस्थान ) में दुर्ग वाले टीले में एक चबूतरे पर एक कुंआ , अग्नि वेदी और एक आयताकार गर्त  मिला है जिसके भीतर चारों ओर पालतू पशु की हड्डी और हिरन के सींग मिले हैं । नोट : - लोथल और बनावली से भी अग्नि वेदिकाओं के प्रमाण मिले हैं ।
स्रोत सिन्धु सभ्यता , किरन कुमार थपलियाल

प्र०-4. वैदिक देवता वरुण के बारे में निम्नांकित कथनों पर विचार कीजिये और नीचे दिये गये उत्तर - संकेत के अनुसार अपना उत्तर चुनिये
1. नैतिक व्यवस्था के संरक्षक थे
2. झंझावात के देवता थे
3. पापियों को दंड देते थे
4. वर्षा के देवता थे
( a )  1 एवं 2 सही हैं  
( b )  1 एवं 3 सही हैं
( c )  1 एवं 4 सही हैं
( d )  2 एवं 4 सही हैं  

उत्तर ( b )  1 एवं 3 सही हैं
 व्याख्या : ऋग्वेद में वरुण को " ऋतस्य गोपा " कहा गया है जो नैतिक व्यवस्था के संरक्षक तथा पापियों को दण्ड देते थे । अर्थात् इन्हें विश्व का अधिपति और नैतिक नियमों का संरक्षक कहा गया है । यह ईरान में अहुरमज्दा और यूनान में " ओरनोज " के नाम से प्रतिष्ठित हुए । झंझावत और वर्षा के देवता इन्द्र थे ।
स्रोत - भारत का वृहत् इतिहास , मजूमदार , राय चौधरी , प्राचीन भारत का इतिहास , झॉ एवं श्रीमाली

प्र०-5. सूक्त में समाज के चतुर्विध वर्गीकरण का विचार प्राप्त होता है
( a ) ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में
( b ) ऋग्वेद के केशिन सूक्त में
( c ) अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में
( d ) ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में

उत्तर - ( d ) ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में
 व्याख्या : ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में समाज के चतुर्विध वर्गीकरण अर्थात् चातुर्वर्ण व्यवस्था का प्राचीनतम उल्लेख प्राप्त होता है । इसमें यह कहा गया है । कि जब देवताओं ने विराट पुरुष की बलि दी तो . उसके मुख भाग से ब्राह्मण , भुजाओं से राजन्य ( क्षत्रिय ) , उरू माग से वैश्य तथा पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए ।
स्रोत - प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति , के ० सी ० श्रीवास्तव

प्र०-6. निष्क्रमण के बाद और समावर्तन के पहले कितने संस्कार सम्पन्न होते थे ?
( a ) तीन
( b ) चार
( c ) पाँच
( d ) सात  

उत्तर ( d ) सात  
 व्याख्या : सोलह संस्कारों में निष्क्रमण और समावर्तन के मध्य सात संस्कार होते थे । ये सात संस्कार क्रमशः निम्न हैं- अन्नप्राशन , चूडाकर्म , कर्णवेध , विद्यारम्भ , उपनयन , वेदारम्भ और केशान्त ।
स्रोत - प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति . के ० सी ० श्रीवास्तव  

प्र०-7. निम्नलिखित में से कौन - सा ऋण ' तीन ऋणों के सिद्धान्त में समाहित नहीं है ?
( a )  पुत्र ऋण
( b ) पितृ ऋण
( c ) गुरु ऋण ( ऋषि ऋण )
( d ) देव ऋण

उत्तर ( a )  पुत्र ऋण
व्याख्या :  गृहस्थाश्रम में मनुष्य को विभिन्न संस्कारों का  अनुष्ठान  करना पड़ता था जो जन्म से लेकर मृत्यु तक चलते थे । इसी आश्रम में मनुष्य तीन ऋणों से मुक्ति प्राप्त करता था जिनका विधान धर्म ग्रन्थों में हुआ है । ये ऋण हैं
1.देवऋण - ऐसी मान्यता थी कि व्यक्ति के जन्म के समय उसके ऊपर देवी - देवताओं की महती कृपा रहती है अत : उसका कर्त्तव्य है कि वह देवताओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करे । इससे मुक्ति तभी सम्भव है जब मनुष्य यथाशक्ति यज्ञों का अनुष्ठान करे ।
2.ऋषिऋण - विधि पूर्वक वेदों का अध्ययन करने से ऋषि ऋण से मुक्ति मिल जाती थी । 3. पितृऋण - धर्मानुसार सन्तानोत्पन्न करके व्यक्ति पितृ ऋण से मुक्ति पाता था ।
उपर्युक्त तीनों ऋणों से उऋण होना मनुष्य का परम कर्त्तव्य माना गया था ।
स्रोत - प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति . के ० सी ० श्रीवास्तव

प्र०-8. निम्नांकित बौद्ध ग्रंथों में किसमें संघ - जीवन के नियम प्राप्त होते हैं ?
( a ) अभिधम्म - पिटक
( b ) दीघ निकाय
( c ) विनय - पिटक
( d ) विभाषा शास्त्र

उत्तर ( c ) विनय - पिटक
व्याख्या :  महात्मा बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन पिटकों में विभाजित किया गया
1. विनय पिटक - इसमें संघ सम्बन्धी नियम तथा दैनिक जीवन सम्बन्धी , आचार - विचारों विधि निषेधों आदि का संग्रह है ।
2. सुत्त पिटक - इसमें बौद्ध धर्म के सिद्धान्त तथा उपदेशों का संग्रह है ।
3. अभिधम्म पिटक -  इसमें दार्शनिक सिद्धान्तों का संग्रह मिलता है ।
उपर्युक्त तीनों को त्रिपिटक की संज्ञा दी जाती है । दीर्घ निकाय सुत्त पिटक का एक निकाय है । जिसमें बुद्ध के उपदेश वार्तालाप के रूप में दिये गये हैं । त्रिपिटकों पर लिखे गये भाष्य को विभाषाशास्त्र कहा जाता है ।

प्र०-9. निम्नांकित भारतीय - यूनानी शासकों में से कौन भारतीय बौद्ध साहित्य में उल्लिखित है ?
( a ) डेमिट्रियस
( b ) मेनांडर
( c ) स्ट्रैटो
( d ) अंटियल्किदस

उत्तर ( b ) मेनांडर
व्याख्या :   बौद्ध ग्रन्थ मिलिन्दपन्हों में भारतीय यूनानी शासक मेनाण्डर का नाम मिलता है । मिलिन्दपन्हों की रचना नागसेन ने पाली भाषा में की है । इस ग्रन्थ में यवन राजा मेनाण्डर तथा बौद्ध भिक्षु नागसेन के वार्तालाप का वर्णन है । मिलिन्द ( मेनाण्डर ) धार्मिक प्रवृत्ति का मनुष्य था । वह अपने संशयों एवं शंकाओं के निवारणार्थ किसी विद्वान से वाद - विवाद करना चाहता था । अन्त में वह बौद्ध भिक्षु नागसेन के सम्पर्क में आया । नागसेन उसके अनेक गूढ़ दार्शनिक प्रश्नों का उत्तर देते हुए उसकी धार्मिक जिज्ञासा को शान्त करते थे ।
स्रोत - प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति , के ० सी ० श्रीवास्तव

प्र०-10. जैन विश्वास के अनुसार तेईसवें तीर्थकर कौन थे ?
( a ) ऋषभदेव  ( b ) पार्श्वनाथ  ( c ) अरिष्टनेमि ( d ) महावीर

उत्तर ( b ) पार्श्वनाथ  
व्याख्या :  जैन अनुश्रुति के अनुसार जैन धर्म में तीर्थकरों की संख्या 24 बतायी गयी है । प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव थे । पार्श्वनाथ जैन धर्म के तेइसवें तीर्थकर थे और इनका जन्म महावीर से 250 वर्ष पूर्व हुआ था । ये काशी नरेश अश्वसेन ( आससेन ) के पुत्र थे । इनकी माता का नाम वामा तथा पत्नी का नाम प्रभावती था । महावीर जैन धर्म के चौबीसवें  तीर्थकर थे । इनका जन्म वैशाली के निकट कुण्डाग्राम में हुआ | था । इनके पिता का नाम सिद्धार्थ तथा माता का नाम त्रिशला था । महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था । इनकी पत्नी का नाम यशोदा था ।
स्रोत - प्राचीन भारत का राजनैतिक तथा संस्कृति का इतिहास , वी ० सी ० पाण्डेय

प्र०-11. जैन धर्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन - सा कथन सही है ?
( a ) यह कर्मवाद में विश्वास करता है
( b ) यह कर्मवाद में विश्वास नहीं करता है
( c ) यह कर्मवाद के सम्बन्ध में मौन है
( d ) यह कर्मवाद की भर्त्सना करता है

उत्तर- ( a ) यह कर्मवाद में विश्वास करता है
व्याख्या :  जैन धर्म ईश्वर को सृष्टिकर्ता नहीं मानता क्योंकि ऐसा करने से उसे संसार के पापों और कुकर्मों का कर्ता भी मानना पड़ता । जैन धर्म ने मनुष्य को ईश्वरीय हस्तक्षेप से मुक्त करके स्वयं अपना भाग्य विधाता माना है । उसके सारे सुख - दुःख - कर्म के कारण ही हैं । कर्म ही मनुष्यों की मृत्यु के कारण है । मनुष्य अपने जिन कुटुम्बियों के लिए कर्म करता हैं , वे तो उनकी मृत्यु के पश्चात उसकी सम्पत्ति के स्वामी बन बैठते हैं और उस मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है । जिन कर्मों से बँधा हुआ यह जीव संसार में  परिभ्रमण करता है । ये संख्या में 8 हैं - ( 1 ) ज्ञानवरणीय ( 2 ) दर्शनावरणीय ( 5 ) वेदनीय ( 4 ) मोहनीय ( 5 ) आयुकर्म नाम ( 6 ) कर्म ( 7 ) गोत्रकर्म ( 8 ) अन्तराय कर्म । स्रोत - प्राचीन भारत का राजनैतिक तथा सांस्कृतिक इतिहास , भाग -1 .

प्र०-12. भागवत धर्म में कितने प्रकार की भक्ति का उल्लेख है ?
( a ) आठ   ( b ) नौ  ( c ) दस  ( d ) ग्यारह

उत्तर ( b ) नौ  
व्याख्या :  भागवत गीता में ( भागवत धर्म का प्रमुख ग्रन्थ ) में भक्ति 9 प्रकार की बतायी गयी है जो निम्न है
' श्रवणं कीर्तनम् विष्णोः स्मरणम् पादः सेवनम् ।
अर्चनम् वन्दनं दास्यम् साख्यात्म निवेदनम् ।।

प्र०-13. निम्नांकित में से पांचरात्र व्यूह के चार देवता कौन हैं ?
1. अनिरुद्ध   2. लक्ष्मी  3. प्रद्युम्न  5. संकर्षण 5. इंद्र   6. वासुदेव
( a ) 1 , 3 , 5 , 6
( b ) 1 , 2 , 3,5
 ( c ) 2 , 3 , 4 , 5
( d ) 1 , 2 , 3 , 4

उत्तर ( a ) 1 , 3 , 5 , 6
व्याख्या :   भागवत अथवा पांचरात्र धर्म में वासुदेव विष्णु ( कृष्ण ) की उपासना के साथ ही साथ तीन अन्य व्यक्तियों की भी उपासना की जाती थी । इनके नाम इस प्रकार हैं
1. संकर्षण ( बलराम ) -ये वसुदेवं के रोहिणी से उत्पन्न पुत्र थे ।
2. प्रद्युम्न - ये कृष्ण के रूक्मिणी से उत्पन्न पुत्र थे ।
3. अनिरुद्ध - ये प्रद्युम्न के पुत्र थे ।
उपुर्यक्त चारों को ' चतुर्दूह ' की संज्ञा दी जाती है । वासुदेव के समान इनकी भी मूर्तियाँ बनाकर भागवत मतानुयायी पूजा किया करते थे ।
स्रोत - प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति , के ० सी ० श्रीवास्तव

प्र०-14. पाशुपत संप्रदाय के संस्थापक कौन थे ?
( a ) बसव
( b ) गोरखनाथ
( c ) कुशिक
( d ) लकुलीश

उत्तर- ( d ) लकुलीश
व्याख्या :  पाशुपत सम्प्रदाय शैवों का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है जिसकी उत्पत्ति ईसा पूर्व दूसरी शती में हुई थी । पुराणों के अनुसार इस सम्प्रदाय की स्थापना लकुलीश अथवा लकुली नामक ब्रह्मचारी ने की थी । जिस समय वासुदेव कृष्ण उत्तरी भारत में अपना धर्म प्रचार कर रहे थे , उस समय पश्चिमी भारत का कायावरोहण नामक स्थान पर लकुलीश का जन्म हुआ था । वह शिव के अट्ठाइसवें और अन्तिम अवतार थे ।
स्रोत - प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास , डॉ . जयशंकर मिश्र

प्र०-15. निम्नांकित में से किस सम्प्रदाय में पंचमकारों का विधान है ?
( a ) कौल ( d ) त्रिक ( b ) पाशुपत ( c ) शैव

उत्तर - ( a ) कौल
व्याख्या : शाक्त धर्म ( शक्ति की उपासना ) के अनुयायी दो वर्गों में बँटे थे - कौल मार्गी और समयाचारी । पूर्ण रूप से अद्वैतवादी साधक कौल कहे जाते हैं । समयाचारी शाक्त अन्तरसाधना में अधिक समय व्यतीत करते हैं । कौल मार्गी " पंचमकार ' की उपासना करते हैं जिनमें मद्य , मांस , मत्स्य , मुद्रा और मैथुन हैं , जो ' ' से प्रारम्भ होते हैं । ऐन्द्रिय आनन्द के लिए वे निम्न आचरण करते हैं । तामस साधक भौतिक आधार पर इनका अनुगमन करते और क्षणिक सिद्धि प्राप्त करते हैं । वस्तुतः पंचमकार का लाक्षणिक अर्थ इस प्रकार है
1. मधु अथवा मद्य -इसका अर्थ है सहस्रदल कमल से क्षरित होने वाली सुधा ।
2. माँस - इसका अर्थ है पाप और पुण्य का नाश और हनन
3. मत्स्य -इसका अर्थ है इड़ा और पिंगला में प्रवाहित होने वाले श्वास ।
4. मुद्रा -असत् संग से त्याग की स्थिति
5. मैथुन - इसका अर्थ है सहस्रार में स्थित शिव का तथा कुण्डलिनी शक्ति का योग या सुषुम्ना नाड़ी में प्राण वायु का सम्मिलन ।
स्रोत - प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास . डॉ . जयशंकर मिश्र

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